रविवार, अप्रैल 24, 2011

तू


तेरा नाम मैंने धडकनों की तरह
अपने मन में
धड़कने को छोड़ दिया
अब तुम बात ना करो,
जवाब ना दो, मुझसे मतलब ना रखो
तब भी हर पल
तुम मुझमे धडकते हो

छोड़ दिया है मैंने तुम्हे
अपने भीतर
ॐ की तरह ,
जिसको अब मैं गुनु या ना गुनु
वो मेरे भीतर सदैव है

सब अँधेरे के रास्ते
जाने कहाँ छूट गए
अब बस तू
प्रकाश की भांति
मुझमे प्रवाहित है !

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

गुरु शिष्य सम्बन्ध


अभी रविवार को मैं दिल्ली गयी हुई थी अचानक एक फ़ोन आया
मैडम आप कहाँ हो?
मैंने कहा दिल्ली, क्यूँ क्या हुआ....
आप कब आओगे आपसे मिलना था....

जब वापस घर आयी फिर कॉल आया...मैडम आओ कालेज आ रहे हो..मैंने कहा हाँ अभी आ रही हूँ...ऐसा क्या हुआ की इतने फ़ोन कर रहे हो तुम लोग...कालेज पहुचती हूँ तो देखती हूँ मेरे स्टुडेंट्स को कुछ आवेदन पत्र वगेरह को सत्यापित करना था और जिनकी अंतिम तिथि आज की ही थी....मैंने सत्यापित करके कहा अरे किसी और से करा लेते ना आज इतनी भीड़ होगी फार्म जमा करने का अंतिम दिन है...पहले भी कितनी बार कहा है किसी और टीचर से मेरा नाम लेके करा लिया करो.....
मैडम हमें आपसे ही करना है...क्यूँकी आपके सत्यापित करने से हमें आपका आशीर्वाद भी मिल जाता है और ये गुड लक जैसे काम करता है इसलियें हम आपके ही पास आते हैं.

ये सुनकर मैं एकदम दंग रह गयी....समझ नहीं आया क्या प्रतिक्रिया दूं... आज भी विद्यार्थियों के लिए शिक्षको की शुभकामनाएं इतना मायने रखती है....मैं नहीं जानती उनके इस विश्वास, श्रद्धा के लिए क्या कहूँ....ये अहसास एकदम निशब्द है...जिसको मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी...ये अहसास मेरा विश्वास गहरा करने में की मैंने सही राह चुनी है और मुझे मेरे विद्यार्थियों को और अच्छी शिक्षा देने के लिए हमेशा प्रेरणा देता रहेगा ! मैं ज्यादा नहीं अगर कुछ लोगों के जीवन को दिशा देने में ही सक्षम रहूँ तो ये मेरी शिक्षा, मेरी परवरिश की सबसे बड़ी सार्थकता साबित होगी!
 

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