
शब्दों में ढालनें से,
अपने ज़ज्बातों को डरती थी मैं,
अपने कहीं तज ना दे,
जब मिली तुमसे,
की पहली बार कोशिश,
शब्दों को गुनने की,
पर जब तुम मुझे तज चल दिए,
मेरा शब्दों से साथ सदा के लिए छूट गया !
मेरा जन्म हुआ इश्क से...मेरा जन्म हुआ इश्क के लिए...इश्क का हर रूप हर रंग जीवन में यहाँ वहां छलका हुआ है...ढूंढ सको तो ढूंढ लो जो रंग चाहिए जीवन इन्द्रधनुषी करने के लिए
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5 टिप्पणियाँ:
naya blog aacha hai sorry hindi shabdkosh kaam hai mere paas but bahut badhiya hai naya look,
Manish
शुक्रिया मनीष...जितने शब्दों में कहा वो ही बहुत ज्यादा है...तुम्हे ये नया रूप पसंद आया...शुक्रिया...ब्लॉग का ये कलेवर...मुझे मेरे व्यक्तित्व की झलक देता सा लगता है...
जज्बात शब्दों के मोहताज़ नहीं ...
सुन्दर शब्दों में जज़्बात को ढाला
साथ कहाँ छूटा जी.
शब्द तो अखंड हैं,अनंत हैं.
सुन्दर भावमय प्रस्तुति के लिए आभार.
वाह! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! ख़ूबसूरत प्रस्तुती!
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