क्या यादों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती? क्यूँ कुछ लोग साल दर साल याद आते रहते हैं....चाहो ना चाहो याद जाने कहाँ से इतने पहरेदारों, कैमरों के बाद भी अन्दर घुस ही जाती है और फिर कहीं छुप के ऐसे कहीं बैठ जाती है की कितने ही जासूस, पुलिस पीछे लगा दो मिलती ही नहीं...ईश्वर से कितनी ही प्राथना करो...मंदिरों मस्जिदों पर मन्नत का धागा बांधो...की मोलवी से ताबीज़ बंधवा लूं ...कुछ नही होता ...किसी ने कहा इक्कीस दिन मंदिर जाओ और हमने भी बिना नागा रोज ईश्वर के दरबार में हाजिरी दी पर एकीसवें दिन तक लगा ईश्वर ने तो हमें उनको ना भूलने का वर दे डाला...कहीं ईश्वर तुमने मेरी प्राथना गलत तो नहीं सुन ली ...या मेरे ही शब्द जबान से निकलते समय मुझसे दगा कर गए....किसी ने कहाँ पहाड़ी वाले पीर बाबा से ताबीज़ बंधवा लो वो तुम्हारी याद के प्रेत को की आत्मा जो भी हो उससे मुझे दूर रखेगा...पहाड़ी पर चढ़ते चढ़ते पैर छिलने लगे पर तुम्हारी याद का दर्द इन छालों से कहीं ज्यादा था.... पीर बाबा तुमने ताबीज़ बांधते वक़्त ये कौनसा मंत्र फूंका की उसकी याद जूनून बन गयी...और अब पहले से ज्यादा हर पल साथ है...साया भी दिन ढलने पर साथ छोड़ देता है पर याद तो दिन के चोबीस घंटे , हर घडी साथ ही रहती है...एक दोस्त ने कहा किसी और से मिल कर देखो कौन जाने मन से उसकी यादें धुंधला जाएँ....सही ही कहा था धुंधला तो गयी थी मेरी आँखे ...लगता था अब याद मेरा पीछा छोड़ देगी पर जब सूरज निकला और धुंध हटी तुम्हारी यादें पहले से भी ज्यादा शिद्दत से साथ हो ली...एक दिन मैंने तुम्हारी पसंद के सब दुपट्टे निकाले... और ऐसे रंगों में रंगवाये जिनसे तुम्हारी कोई याद पसंद ना छलके ...पर रंगरेज मेरे तूने ये किस जनम का बदला लिया, तूने ये कौनसा रंग डाला की हर रंग तुम्हारा ही लगता है...मेरे पहले से ज्यादा करीब हो जाता है..जब भी चुनर ओढ़ी और खुद को देखा तुम्हारी नज़रें अपने ऊपर ही पायी....बार बार धोया हर रंग मैंने पानी में...पर पानी ने भी हर रंग को और शोख बनाया....जितना धोया उतना ये मुझपे और चढ़ता गया... सारी नदिया तुम्हारे ही रंग में रंग गयी....कहीं तुमने तो रंगरेज को रिश्वत नहीं दी इश्क का रंग चढ़ने को... की तुमने नदिया को अपने हाथों से छु प्रेममय होने का वरदान दे डाला ?
छत्तीस का आकड़ा है ….
1 सप्ताह पहले












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