कभी तो हम फिर से बैठकर फ़ुर्सत मे बातें करे. जब तुम ये ना कहो फटाफट बोलो क्या बात है, ना मैं कहूँ जल्दी बोलो कॉलेज जाना है. बस बातें शुरू हो और बिना किसी अवरोध के एक बात दूसरी का सिरा पकड़े और ये सिलसिला चलता चले. कभी चाय की चुस्कियों के साथ तो कभी पेप्सी के केन के साथ. तुम शुरू तो करो अपने ऑफीस से पर खोते जाओ अपने कॉलेज, स्कूल की बातों मे. तुम बयान करो अपने मॅनेजर के खड़ूसपने को और मैं भी देखने लगूँ उसमे अपने पीएचडी के सूपरवाइज़र को. जब करेंगे बातें हम अपने सहकर्मियों की तो कहीं से निकल ही आएँगे कुछ भूले बिसरे यार दोस्त पुरानी तस्वीरों. कभी हम करने लगे बातें अपने स्कूल के मनपसंद टीचर की तो कभी पी टी और फिज़िक्स के उस डरावने टीचर की. कभी याद करे केमिस्ट्री की नाज़ुक सी मेडम की तो कभी गणित के टीचर के डंडे को. कभी याद करे दीदी की गुल्लक से चुराए 1रूपीए को तो कभी स्कूल के लंच पीरियड मे बचाए पैसो से खरीदे जन्मदिन के तोह्फो की. गुब्बारेवाले की आवाज़ नही सुनती अब यहाँ कभी शोक मनाए इस बात का तो कभी मुस्कुराए भरी दुपहरी में आइस्क्रीम वाले की घंटी सुन नंगे पैर दौड़ कर आइस्क्रीम लाने को याद कर. मिलकर तय करें मंदिर में दोनो वक़्त की आरती मे जाके प्रसाद पाने की खुशी ज़्यादा थी या उसके आँगन मे खेलने की. बस कहें हम अपने अपने दिल की, ना ज़्यादा दिमाग़ लगाए ना परखने बैठे कुछ भी.
2 टिप्पणियाँ:
आपके भावों ने दिल को छू लिया।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
आपकी भावनाओ को अपने आपको नजदीक पाया।
आपने सोचा उसी भाषा मे लिखा, सुन्दर!!
आभार/ मगल भावनाऐ
हे! प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई-टाईगर
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