विकास त रजऊ सैतालीस में आई (भोजपुरी)
2 दिन पहले
मेरा जन्म हुआ इश्क से...मेरा जन्म हुआ इश्क के लिए...इश्क का हर रूप हर रंग जीवन में यहाँ वहां छलका हुआ है...ढूंढ सको तो ढूंढ लो जो रंग चाहिए जीवन इन्द्रधनुषी करने के लिए
कभी कभी मुझे लगता है की शायद इंसान से दुष्ट कोई नहीं है. अपने आस पास जिसे भी देखू सब अपने ऊपर एक आवरण चढ़ाये हैं. कितना ही लगे की ये इंसान बाकी सबसे अलग है पर असलियत में ऐसा नहीं है शायद एक दो ही ऐसे लोग हो जो भीड़ से हटकर हैं या जिनमे कुछ अलग है. एक सबसे बड़ी फितरत इंसान की वो बोरे बहुत जल्दी हो जाते हैं. जब भी कोई रिश्ता शुरू होता है वो बहुत सुन्दर लगता है, एकदम नया नया सा. धीरे धीरे उससे लोग बोर होने लगते हैं और फिर दुसरे रिश्ते उनकी ज़िन्दगी में जगह ले लेते हैं. जो लोग कभी उनकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हिस्सा थे उन्हें ऐसे काटकर अलग कर देते है की वो कभी था ही नहीं . मैं पहले मानती थी की ऐसा नहीं होता अगर आपने किसी की ज़िन्दगी को उसके साथ जीया है या किसी ने हर पर आपकी ज़िन्दगी को महसूस किया है वो लोग कभी दूर नहीं हो सकते वहां कभी भी कुछ बीच नहीं आ सकता. अगर आपके बीच टकराव है तो उससे बहार आने का रास्ता धुंध लिया जाये तो रिश्ते मजबूत होते हैं. पर शायद यही गलती है जिसे सभी करते हैं. प्राय सभी की ज़िन्दगी में रेप्लेस्मेंट्स होते हैं, जैसे ही उन्हें दूसरा मिले वो पहले को हटा दूसरे को जगह दे देते हैं या जगह खाली होते ही भर देते हैं. आपका किसी के साथ बीताया समय आपको याद ही नहीं रहता अपने नए रिश्तों, ज़िन्दगी में. जिस इंसान से आप रोज मिलने के बाद भी फ़ोन पे, नेट पे बात करते हो अब आपको उसकी फ़ोन उठाने की भी जरुरत महसूस नहीं होती. जिस इंसान ने आपके हर अच्छे बुरे में आपका साथ दिया हो वो अब ज़िन्दगी का कहीं हिस्सा नहीं क्यूंकि आप अपनी नयी ज़िन्दगी में बहुत व्यस्त हैं. खून के रिश्ते और वैवाहिक रिश्तों में पालन करने की अनिवार्यता सामान्यता बहुत ज्यादा होती है,आप अगर दूर जाना भी चाहे तो काफी मुश्किल है पर इसके अलावा जो रिश्ते है उनमे कहीं कोई अनिवार्यता साथ निभाने की पाबन्दी नहीं होती. मुझे लगता था ये रिश्ते बहुत खूबसूरत और अनूठे होते हैं क्यूंकि ये हमें हमारे खून से नहीं मन से सीचने होते हैं. यहाँ अगर कुछ कडवाहट हुई तो निभाने की अनिवार्यता न होने से साथ कभी भी छूट सकता है. इसलिए रिश्ते के दोनों पक्षों को बहुत विश्वास और प्यार से एस रिश्ते को पुष्पित पल्लवित करना पड़ता है. आज लगतI है मेरा सोचना सही है या नहीं ?
ये आदतें भी अजीब होती है भूले से भी नहीं भूलती...हर पल हर लम्हा बिना चाहे बिना सोचे बस कुछ कर बैठती हूँ....सोचती हूँ अब तुमको मैं किसी बहाने याद नहीं करुँगी.....पर अजीब है जब देखो तुम तैयार रहते हो मेरी हर बात में शामिल होने के लिए.....जब सुबह कॉलेज जाने के लिए आईने के सामने खड़े हो मैं तैयार होने लगती हूँ जाने कहाँ तुम्हारी जुगनू सी आँखे चमक पड़ती हैं....और मैं भी चुपके से शीशे में देखती हूँ क्या मैंने सही बिंदी लगायी है..कही मेरा कजरा ज्यादा तो नहीं है......ये ड्रेस मुझ पर जँच रहा है की नहीं.......और जब तक तुम्हारी आँखों में संतुष्टि नहीं दिखती लगता है मैं तैयार हो ही नहीं पाती हूँ.....कितनी ही बार मैं ऊँचे हील के सेंडिल पहन दरवाजे तक आ जाती हूँ अचानक लगता है तुमने टोका की कुछ और पहनो न, जूते! कहीं तुम इनमे गिर न जाओ और मैं वापस मुड़कर स्पोर्ट्स शु पहन बाहर निकलती हूँ...जब कभी क्लास के लिए देर हो जाती है और कई बार भागते भागते मेरे कदम अपने आप रुक जाते हैं और मैं आराम से चलने लगती हूँ...लगता है तुमने पीछे से आवाज देकर कहा अरे धीरे चलो तुम अभी गिर जाओगी.....जब कभी पढ़ाते पढ़ाते मैं अपने स्टुडेंट्स के साथ थोड़ी गंभीर हो जाती हूँ अचानक याद आता है तुम हमेशा कहते थे तुम किसे पढ़ोगी अभी तो खुद ही बच्ची हो और मैं मन ही मन मुस्कुरा उठती हूँ...जब कभी मन करता है किसी का सर फोड़ दूं, डांट दूं मैं कुछ कहने वाली ही होती हूँ तभी तुम मुस्कुराते दिखते हो और कहते हो तुम हंसती हुई ज्यादा अच्छी लगती हो और मैं बेबस हो शांत हो जाती हूँ.....
ऐसे ही और भी न जाने कितने पल है जब तुम अपने आप मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो जाते हो....कहीं से भी किसी भी झिरी से ना चाहते हुए भी तुम मेरे मन और मस्तिष्क में चले आते हो.....और हंसकर कहते हो भाग सको तो भाग लो पर तुम कहीं नहीं जा पाओगी ........और मुझे छेड़ते हुए गुनगुनाते हो..... तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई :)
सुरभि ...
चित्र साभार गूगल





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