रविवार, मई 16, 2021

कौनसी है वो खुशबु जो तुम्हारे मन को महका जाए ?


तुमको पाकर दुनिया बिलकुल नयी सी हो गयी...ऐसा नहीं तुम पहले बार मिले हो पर इस तरह बस इस बार मिले...अब कोई उलझन मुझे उलझती नहीं अब कोई परेशानी मुझे डरती नहीं...सांस लेती हूँ तो पूर्णत जीवंत होने का अहसास पाती हूँ....लोगों की बातें, लोगों के ताने कुछ मुझ तक पहुच नहीं पाते...जब भी तैयार होने को आईने के सामने खड़ी होती हूँ...सोचती हूँ कौनसा रंग है जो तुम्हे रुचेगा...कौनसी लिपस्टिक है जिसे मेरे होठो पे देख तुम उसको चखने को मचल उठो....कौनसा परफ्यूम है जो तुम्हे बस मेरे होने का अहसास दिलाएगा...कोई ऐसे सुगंध जो बस मेरी ही हो...Bvlgari का rose क्या तुम्हारी साँसों को गुलाबी गुलाबों की खुशबु से महका पायेगा....Elizabeth Arden का मेरा पसंदीदा इत्र तुम्हे सुबह से ताजगी दे पायेगा...Burberry का चन्दन, मोगरे की खुशबु का मेरा नया  इत्र तुम्हारी साँसे सुवासित कर पायेगा ....Dolce & Gabbana का एकदम नया निकला लिमिटेड एडिशन जिसकी खुशबु दावा करती है किसी को भी अपनी और खीचने की तुम्हे खीच पाएगी...Marc Jacobs का Daisy क्या तुम्हे जादुई दुनिया में ले जा पायेगा....Lancôme का attraction क्या तुमको मेरी और आकर्षित रख पायेगा...Chanel का एक शताब्दी से इत्र की दुनिया में राज कर रहा perfume क्या तुम्हारे दिल को भी छु पायेगा...Givenchy का अब तक का सबसे सेंसुअल perfume क्या तुम्हे भी इंसानी दुनिया से दूसरी दुनिया में ले जा पायेगा....बस यही सोच कर मैं और भी जाने कितने इत्र लगाती हूँ पर सबको हटा देती हूँ...कोई खुशबू नहीं जो मेरे मन को छु पाए...आँख बंद कर मैं एक गहरी सांस लेती हूँ तो मेरा मन कहता है तुम्हारी सांस को महका पाए,तुम्हे हर पल बस मेरे होने का अहसास दिलाये वो मेरी अपनी खुशबू ही हो सकती है...इस खुशबु को कोई भी bottled नहीं कर सकता सिर्फ तुम उसको महसूस कर सकते हो...तुम्हे चाहिए भी तो सब जो सिर्फ तुम्हारा हो तुम्हारे लिए हो...तो बस एक मेरी ही खुशबू ही जो बस तुम्हारी है.

रविवार, अप्रैल 25, 2021

दोस्ती की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती :)

यूँ तो दोस्तों के साथ बिताये सभी पल सुन्दर ही लगते हैं पर फिर भी कुछ ऐसी यादें होती हैं जो हमेशा मन के करीब रहती हैं, चाहे अनचाहे आपको याद दिलाती है की कोई हर पल आपके साथ है ख़ुशी हो या दुःख. लोग कई बार मुझसे पूछते हैं मेरे सबसे अच्छे दोस्त का नाम...मैं जब भी कुछ दोस्तों का नाम लेती हूँ वो कहते हैं नहीं एक. पर जाने क्यूँ कभी मैं किसी एक दोस्त का नाम नहीं ले पाती. ज़िन्दगी में कुछ दोस्त ऐसे हैं जिन्होंने मेरा मन छुआ बस यही सब मेरी दोस्ती की लिस्ट में है. अब उनको ना तो मैं कोई नंबर दे सकती हूँ ना एक दूसरे से उनकी तुलना कर सकती हूँ. ये दोस्त ऐसे हैं जिन्हें मैं कभी भी किसी भी पल फ़ोन कर सकती हूँ बात कर सकती हूँ. इन दोस्तों से जुडी कुछ ऐसी यादें है जो कभी धूमिल नहीं होती हमेशा एकदम ताजा रहती है सुबह के सूरज के जैसे. कई दिन से मैं सोच रही थी अपने ब्लॉग पर कुछ लिखू अपनी यादों के बारे में. अभी हाल ही में मेरी एक प्यारी सी दोस्त प्रियंका का जन्मदिन आया तो मैंने सोचा शुरुआत प्रियंका से ही की जाए...मेरे दोस्तों की कोई नंबर लिस्ट नहीं है...पर शुरुआत के लिए मैंने किसी का जन्मदिन चुना और सबसे पहले प्रियंका का जन्मदिन आया. प्रियंका मेरी बहुत प्यारी सी दोस्त...जिसके साथ बीता हर पल आज भी मेरी आँखों के सामने बिलकुल जीवंत है. उससे मुलाकात कुछ अलग ही ढंग से हुई, मैं TISS में पढ़ती थी और प्रियंका वहां दाखिला लेने के लिए आयी थी. तभी अचानक से उससे मुलाकात हुई. थोड़ी बात हुई उसने कहा अगर मुझे यहाँ दाखिला मिल जाता है मैं आपसे मिलने आऊँगी. और अचानक एकदिन वो लड़की मेरे कमरे के बाहर खड़ी होती है और कहती है मैं आ गयी. बस यही शुरुआत थी एक आजीवन चलनेवाली दोस्ती की...कुछ ही दिनों में ऐसा हो गया की हम दोनों दिन में एक दूसरे से कई बार मिलते..प्रियंका रोज दोपहर खाना खाने के बाद मेरे रूम में आ जाती और हम गप्पें मरते रहते...कभी जब दिन में नहीं आ पाती फिल्ड वर्क के लिए जाना होता तब रात को १-२ बजे मेरा डोर बजता दीदी खोलो और उसके बाद हमारी बातों का जो सिलसिला शुरू होता उसमे विराम लगना असम्भव ही होता...कभी कभी जब मैं कमरे में नहीं होती और दवाजा खुला होता तब प्रियंका मेरा बिस्तर लगाना, मेज़ ठीक करना, कपडे तह करना सब कर चुकी होती...मैं आके कहती ये सब क्यूँ किया तो कहती अब आप मजे से मुझसे बातें करो...कोई और काम नहीं! ऐसी ही और भी बहुत यादें हैं पर एक बात मेरे मन के सबसे करीब है....सब कहते थे हास्टल में जो सामने होता है बस वही आप घर जाओ दूर रहो सब भूल जाते हैं....पर मैंने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया....एक बार में अपने फिल्ड वर्क के लिए घर आयी हुई थी और मैं पांच महीने बाद वापस TISS गयी...मेरा आना अचानक हुआ और प्रियंका का फ़ोन नहीं लगा....जब मैं हास्टल पहुची वो क्लास में जा चुकी थी. दोपहर के खान एके बाद मैं हॉल के बाहर दोस्तों से बातें कर रही थी...अचानक से किसी ने बहुत जोर से चिल्लाया और बोला दी....और तेजी सी भागती प्रियंका मेरे गले लग गयो और बहुत देर तक एकदम खामोश रही और फिर बोली आपने कितने दिन लगाये.... डायनिंग हॉल के अन्दर बाहर सब हम दोनों को ही देख रहे थे...क्यूंकि प्रियंका सामान्यता बहुत ही शांत रहती है वो कभी publicly loud नहीं होती है और उसका ऐसे चीखना और भागकर गले लगना उसके सामान्य व्यवहार से अलग था. आज भी वो पल मेरी अनखो के सामने जीवंत है. हमारी दोस्ती में बहुत उतरा चढाव आये, झगड़ा भी हुआ पर तुरंत फिर से बात शुरू. अभी मैं और प्रियंका हज़ारों मील दूर रहते हैं फिर भी हम एक दूसरे के बिलकुल करीब हैं मन से...अब भी प्रियंका वैसे ही जिदें करती हैं और मैं उसको पहले डांटती हूँ, पर उसके मस्का लगाने से मान भी जाती हूँ. पिया (प्रियंका के लिए दिया मेरा नाम ) i really miss u a lot! लोग झूठ कहते हैं out of sight out of mind....मुझे तो लगता है दोस्ती की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती :)

शनिवार, नवंबर 14, 2020

कुछ यादें इश्क की गलियों से

क्या अब भी कोई आता है तुमसे मिलने ऑफिस से आते वक़्त, क्या ट्रेन में बैठते वक़्त अब भी क्या तुम्हे मेरे आने का इंतज़ार रहता है क्या कभी तुम भूल जाते हो कि अब मैं उस शहर में नहीं हूँ और तुम्हे रहती है जल्दी घर पहुचने की, क्या अब भी तुम घर पहुच कर खोल कर बैठ जाते हो लैपटॉप और चलता है शायरी, अंतराक्षी और बातों का दौर, क्या अब भी तुम्हे हर पल मिलते है कुछ sms और missed कॉल सर्दी कि रातों में हाथों में हाथ डाले सड़क पर घूमते लोगों को देख मेरी याद आती है? क्या अब भी तुम्हे डर रहता है वक़्त बेवक्त किसी के घर आने का, क्या अब भी अँधेरी रातों में बिस्तर पर तुम्हारे हाथ मुझे ढूंढते हैं, क्या अब भी सुबह कि पहली किरण और ऑफिस जाना तुम्हे उतना ही बोझिल लगता है क्या अब भी तुम हर दिन को शुक्रवार और शनिवार में बदलना चाहते हो ताकि तुम्हे ऑफिस न जाना पड़े, जब बरफ कि झड़ी लगी है सारे शहर में क्या कोई तुम्हे अकेला न छोड़ने का प्रण कर तुम्हारे पास आता है क्या अब भी तुम्हे ढूंढने पड़ते है लिपस्टिक के रंग, और चुनना पड़ता है कपड़ो के रंग ? चित्र साभार गूगल

सोमवार, अक्टूबर 26, 2020

कशमकश

कभी कभी मुझे लगता है की शायद इंसान से दुष्ट कोई नहीं है. अपने आस पास जिसे भी देखू सब अपने ऊपर एक आवरण चढ़ाये हैं. कितना ही लगे की ये इंसान बाकी सबसे अलग है पर असलियत में ऐसा नहीं है शायद एक दो ही ऐसे लोग हो जो भीड़ से हटकर हैं या जिनमे कुछ अलग है. एक सबसे बड़ी फितरत इंसान की वो बोरे बहुत जल्दी हो जाते हैं. जब भी कोई रिश्ता शुरू होता है वो बहुत सुन्दर लगता है, एकदम नया नया सा. धीरे धीरे उससे लोग बोर होने लगते हैं और फिर दुसरे रिश्ते उनकी ज़िन्दगी में जगह ले लेते हैं. जो लोग कभी उनकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हिस्सा थे उन्हें ऐसे काटकर अलग कर देते है की वो कभी था ही नहीं . मैं पहले मानती थी की ऐसा नहीं होता अगर आपने किसी की ज़िन्दगी को उसके साथ जीया है या किसी ने हर पर आपकी ज़िन्दगी को महसूस किया है वो लोग कभी दूर नहीं हो सकते वहां कभी भी कुछ बीच नहीं आ सकता. अगर आपके बीच टकराव है तो उससे बहार आने का रास्ता धुंध लिया जाये तो रिश्ते मजबूत होते हैं. पर शायद यही गलती है जिसे सभी करते हैं. प्राय सभी की ज़िन्दगी में रेप्लेस्मेंट्स होते हैं, जैसे ही उन्हें दूसरा मिले वो पहले को हटा दूसरे को जगह दे देते हैं या जगह खाली होते ही भर देते हैं. आपका किसी के साथ बीताया समय आपको याद ही नहीं रहता अपने नए रिश्तों, ज़िन्दगी में. जिस इंसान से आप रोज मिलने के बाद भी फ़ोन पे, नेट पे बात करते हो अब आपको उसकी फ़ोन उठाने की भी जरुरत महसूस नहीं होती. जिस इंसान ने आपके हर अच्छे बुरे में आपका साथ दिया हो वो अब ज़िन्दगी का कहीं हिस्सा नहीं क्यूंकि आप अपनी नयी ज़िन्दगी में बहुत व्यस्त हैं. खून के रिश्ते और वैवाहिक रिश्तों में पालन करने की अनिवार्यता सामान्यता बहुत ज्यादा होती है,आप अगर दूर जाना भी चाहे तो काफी मुश्किल है पर इसके अलावा जो रिश्ते है उनमे कहीं कोई अनिवार्यता साथ निभाने की पाबन्दी नहीं होती. मुझे लगता था ये रिश्ते बहुत खूबसूरत और अनूठे होते हैं क्यूंकि ये हमें हमारे खून से नहीं मन से सीचने होते हैं. यहाँ अगर कुछ कडवाहट हुई तो निभाने की अनिवार्यता न होने से साथ कभी भी छूट सकता है. इसलिए रिश्ते के दोनों पक्षों को बहुत विश्वास और प्यार से एस रिश्ते को पुष्पित पल्लवित करना पड़ता है. आज लगतI है मेरा सोचना सही है या नहीं ?

शनिवार, मार्च 14, 2015

ये आदतें भी अजीब होती है

ये आदतें भी अजीब होती है भूले से भी नहीं भूलती...हर पल हर लम्हा बिना चाहे बिना सोचे बस कुछ कर बैठती हूँ....सोचती हूँ अब तुमको मैं किसी बहाने याद नहीं करुँगी.....पर अजीब है जब देखो तुम तैयार रहते हो मेरी हर बात में शामिल होने के लिए.....जब सुबह कॉलेज जाने के लिए आईने के सामने खड़े हो मैं तैयार होने लगती हूँ जाने कहाँ तुम्हारी जुगनू सी आँखे चमक पड़ती हैं....और मैं भी चुपके से शीशे में देखती हूँ क्या मैंने सही बिंदी लगायी है..कही मेरा कजरा ज्यादा तो नहीं है......ये ड्रेस मुझ पर जँच रहा है की नहीं.......और जब तक तुम्हारी आँखों में संतुष्टि नहीं दिखती लगता है मैं तैयार हो ही नहीं पाती हूँ.....कितनी ही बार मैं ऊँचे हील के सेंडिल पहन दरवाजे तक आ जाती हूँ अचानक लगता है तुमने टोका की कुछ और पहनो न, जूते! कहीं तुम इनमे गिर न जाओ और मैं वापस मुड़कर स्पोर्ट्स शु पहन बाहर निकलती हूँ...जब कभी क्लास के लिए देर हो जाती है और कई बार भागते भागते मेरे कदम अपने आप रुक जाते हैं और मैं आराम से चलने लगती हूँ...लगता है तुमने पीछे से आवाज देकर कहा अरे धीरे चलो तुम अभी गिर जाओगी.....जब कभी पढ़ाते पढ़ाते मैं अपने स्टुडेंट्स के साथ थोड़ी गंभीर हो जाती हूँ अचानक याद आता है तुम हमेशा कहते थे तुम किसे पढ़ोगी अभी तो खुद ही बच्ची हो और मैं मन ही मन मुस्कुरा उठती हूँ...जब कभी मन करता है किसी का सर फोड़ दूं, डांट दूं मैं कुछ कहने वाली ही होती हूँ तभी तुम मुस्कुराते दिखते हो और कहते हो तुम हंसती हुई ज्यादा अच्छी लगती हो और मैं बेबस हो शांत हो जाती हूँ..... ऐसे ही और भी न जाने कितने पल है जब तुम अपने आप मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो जाते हो....कहीं से भी किसी भी झिरी से ना चाहते हुए भी तुम मेरे मन और मस्तिष्क में चले आते हो.....और हंसकर कहते हो भाग सको तो भाग लो पर तुम कहीं नहीं जा पाओगी ........और मुझे छेड़ते हुए गुनगुनाते हो..... तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई :) सुरभि ... चित्र साभार गूगल

बुधवार, अप्रैल 25, 2012

यूँ भी कोई रूठता है ?


तुम्हारा ऐसे चले जाना
बिलकुल नहीं अच्छा लगा मुझे
एक मेसेज कर दिया की
बस अब मुझसे बात ना करना
हमारा रिश्ता खतम
तुम्ही कहो जान
ऐसे भला कोई रूठकर जाता है
जीवन भर के लियें ?

नहीं देती मैं दुहाई
तुम्हारे वायदों की
ना ही देती मैं दुहाई तुम बिन
जीकर भी ना जी पाने की
गर रूठो तो मुझे
मनाने का मौका भी दो,
मैं गलती करूँ कोई तो
सजा देने का अधिकार भी तुम रखो

नहीं कोई गलती ऐसी जहाँ में
जो तोड़ दे इश्क की डोर
नहीं कोई सजा बनी इस जहाँ में
की मेरा ईश्वर ही मुझे छोड़ चल दे !


गुरुवार, अप्रैल 19, 2012

:)



मुझमे अजब सी बैचैन छाई है
शायद ये हवा तुझे छूकर आयी है :)

मंगलवार, अप्रैल 10, 2012

शब्द


शब्दों में ढालनें से,
अपने ज़ज्बातों को डरती थी मैं,
अपने कहीं तज ना दे,
जब मिली तुमसे,
की पहली बार कोशिश,
शब्दों को गुनने की,
पर जब तुम मुझे तज चल दिए,
मेरा शब्दों से साथ सदा के लिए छूट गया !

सोमवार, जनवरी 02, 2012


एक पल ना ठहरी नींद मेरी आँखों में
तेरी यादें मोगरे सा तन महकाती रही
और मेरे मन से नज़में बहती रही

मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

एक दोपहर कांफ्रेस के खाने के नाम



समाजशास्त्र का राष्ट्रीय इस बार जे.न.यु हमारे ही विश्वविद्यालय में था....कांफ्रेंस में दोपहर के खाने की कतार देखकर हम तो डर ही गए और स्कुल की कैंटीन का रास्ता नापने लगे अचानक राह में एक दोस्त मिल गयी बोली चल यार खाना खाते हैं मैंने कहा हाँ चलो खाते हैं कैंटीन में आज तुम्हे बटाटा कान्धा परांठा खिलते है मुंबई छाप. सहेली बोली तेरा सर फिर गया है चल चुपचाप कन्वेंशन सेंटर वहीँ खाना है आज चोथा दिन है और तुम रोज रात को खाती नहीं यहाँ और दिन में कैंटीन... आज तो खाना ही पड़ेगा और हम साथ हैं चल आजा. अब क्या करते...चल दिए कन्वेंशन सेंटर की तरफ!

वहां तो पूरा एक मेला लगा था रोज सुनते थे कोई ३००० लोगों ने हिस्सा लिया है पर यहाँ तो उससे दुगुने लोग थे. पर ऋतू की समझदारी के चलते हम भी एक लाइन का हिस्सा हो लिए. अचानक ऋतू की चिल्लाहट सुनी बोली हाय राम मेरे मुह को, हाथो को क्या हो गया ये लाल लाल दाने....हमने कहा अरे हाँ तुझे तो तेज धुप से अलेर्जी है ना...अब हास्टल जाके बरफ लगाना... ऊपर प्रचंड सूरज सर पर था और आज तुने सनस्क्रीन भी नहीं लगा के आये हाय अल्लाह ऋतू की बच्ची तेरा क्या होगा...हमने कहा अपना दुपट्टा ढक लो तो उसने तुनक कर कहा वह जी खुद ऐसे ही घुमो हमें जोकर बना दो...हमने कहा अरे ऐसा नहीं है देखो हम भी कर रहे हैं ना और दुपट्टे का घूँघट कर लिया..जे.न.यु.के होने का एक फायदा है अब हमको किसी के कुछ कहने से फरक नहीं पड़ता...जैसे अच्छा लगे पहनो रहो....अब कोई कुछ भी सोचे हमारी बला से....पर ऋतू कहाँ चैन लेने देगी हमें मैडम का फरमान आया सुन अपना झोला हमें दे हमें करें लेना है...हमने कहा ले लो भाई पूरा हम तो पहले ही थके हैं तुम्ही पकड़ो इस बोझे को और ढूढ़ लो क्रीम क्राम जो चाहिए. ऋतू हमरे झोले को टटोलती रही और बोली अरे इसमें वो तुम्हारा "इम्पोर्टेड अमेरिका वाला" धूप से बचने वाला क्रीम कहाँ गया ? एक पल को लगा उसने हमारी दुखती राग पर हाथ रख दिया हमने कहा अरे यार वो तो हम जब यहीं रहते थे तब रखते थे अब आज हम अपना रोज का झोला तो लाये नहीं उसमे ही घर पे रह गया होगा. तू भी ना एकदम बेवकूफ है रोज जब सेंटर आएगी तब लाती है आज ये खुले मैदान में सनस्क्रीन नहीं लायी...हमारा पूरा ध्यान इधर कतार पर था आगे खिसके वरना हमारा तो खाने के बाद का सेशन रह जायेगा...पर ये लाइन थी की हिलने का नाम ही नहीं ले रही थी...इतने में हमारा ध्यान गया की कुछ लोग बार बार हमारी लाइन के पास आते हैं और अटक जाते हैं जिससे हम एक जगह अटके थे...एक दो लोग आगे बढे तो हमने देखा वो पानी पीने वाले थे..पर सबा परेशान और लगे गलियां जे. न.यु . को देने ..हमने देखा नल में पानी नहीं था और बिसलरी का कैन लगभग खतम था पर उसके नीचे एक पूरा भरा कैन रखा था...लोग भाषण खूब कर रहे थे पर कोई पानी के लिए कुछ नहीं कर रहा था...सब बस भाषण कर रहे थे और लाइन में लगे लोगों का ध्यान सिर्फ खाने तक पहुचना था...अब हम पानी के पास तक पहुच चुके थे हमने ऋतू को कहा तुम हमारा झोला पकडे रहो अभी तो बहुत देर में नम्बर आएगा और हमने पानी की कैन को टेढ़ा कर दिया और लोग पानी पीने लगे ....कुछ ने हमें दुआ दी और कुछ ने कहा कितना खराब इन्तेजाम है पानी तक नहीं मिल रहा इस कांफ्रेंस में नॉन- व्हेज खाना तो दूर...ये है जे.न. यु. की असलियत भला हो इस लड़की का वरना हम गर्मी में प्यासे मर रहे हैं...अब तक ऊपर रखी कैन का पानी खतम हो चूका था हमने नीचे से कैन उठाया और उसको लगाया और मुस्कुरा के कहा हाँ भाई यही है यहाँ की असलियत हम यहीं के पढ़े हैं और हमको यही सीखाया है की कोई काम छोटा नहीं होता ...लक्ष्य पर ध्यान रखो पर किसी के ऊपर पैर रखके आगे ना बढ़ो....तभी एक लड़का बोला अरे पहले मुझे पानी दो मुझे पेपर पढना है रिसर्च पेपर इन सब बातों में लगूंगा तो क्या खाक पेपर पढूंगा मैडम मैंने खुद जाके काम किया है फिल्ड में....दो चार लोगों ने उसको नजर उठाके देखा...और हमने एक पानी का ग्लास उसकी और बढ़ाते हुए कहा...श्रीमान लगता है आप रिसर्च की कक्षा का पहला सबक ही भूल गए...जब फिल्ड में जाए तो अपनी आँख कान सब खुला रखे...जो बातें बातचीत के दोरान नहीं पता चलती वो अवलोकन से पता चलती है...ज़िन्दगी भी तो एक रिसर्च है जहाँ हर मोड़ पे नए टोपिक हैं...इतने में फिर ऋतू ने हाथ खीचा और बोली हो गया ना पानी लगाया ना अब चल लाइन कितनी आगे बढ़ गयी...हम थोडा ही आगे बढे की लाइन फिर अटक गयी...ऋतू को एक फ़ोन आ गया वो बोली हम आते हैं और दोस्त आये हैं जगह रोके रखना...नम्बर आये तो प्लेट ले लेना...

हमारे आगे एक श्रीमान एकदम सूट बूट में राजा बाबू बनके तैयार थे हमें देखकर मुस्कुराए इतने में पीछे खड़े लडको ने उनसे हाय हल्लो की...और कहाँ हम आपसे मिले थे आपका नम्बर दे दे वगेरह वगेरह ....जैसे ही वो लड़के निबटे बात चीत करके ये श्रीमान जी अंग्रेजी में बोले हम अलीगढ विश्वविद्यालय से आये हैं अभी देखा हमने कैसे आपने पाने की समस्या निबटाई.. हमने हल्का सा मुस्कुरा कर कहा समस्या जैसा कुछ नहीं था...अब श्रीमान जी हमारी जनम कुंडली बनाने की फिराक में थे की इतने में ऋतू ने आके बचा लिया ..उसके हाथ में आइस क्रीम थी बोली जल्दी खा ले बहुत गर्मी है ...हमने उसकी और कृतज्ञता से देखा और इशारे में कहा शुक्रिया हमें बचने के लिए ...पर ये श्रीमान जी एक पल को रुके फिर हमसे बोले आज धूप बहुत तेज है...हम चुप ही रहे की अब कुछ बोला तो ये हमारी सात जन्मो की कुंडली बना ही लेगा...दो मिनट की विराम के बाद महानुभाव फिर बोले आज जरा गर्मी तेज ही है ...और हम दोनों की और देख के मुस्कुरा कर बोले और खासकर लड़कियों के लिए ...हमने देखा ऋतू बस आँखों से बरसती आग को अपनी जबान पर लाने ही वाली थी की हमने उसका हाथ पकड़ा और और पिछले आधे घंटे से ये श्रीमान जो पीछे वाले लडको पर रोब जमाना चाहते थे की देखो लड़की वो भी जे.न.यु की पढने वाली को हम कैसा शीशे में उतारते है.... को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा...अरे अभी तक तो हमें पता ही नहीं था हम तो कुछ और ही समझ बैठे थे....अच्छा हुआ आपने अपना परिचय हमें खुद दे दिया...... की आप लड़की है :D

शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2011

मन की भाषा



आज पिया ने कहा मैं तुम्हे ७२ founts में i love you लिख के भेजूं....पर अजब उलझन में हूँ ये करूँ की ना करूँ ?
तुम्हारे मन तक पहुचे वो शब्द उकेरने की कला मैं भूल सी बैठी हूँ की तुम ही उस लिपि को बाचने की कला खो बैठे हो.
लिपि छोड़ो क्या तुम्हे याद है हमारी अपनी भाषा...कभी बातों में, कभी गीतों में, कभी आँखों में, कभी इशारों में, कभी नज़मों में कभी सड़क किनारे दुकानों पर छपे विज्ञापनों में ...ना कोई शब्द, ना कोई लिपि अब मुझे याद है जो तुम्हारे मन को छु सके...सिर्फ कुछ अहसास हैं...जो बहुत मुश्किल से शब्दों में ढल गए हैं...तुम पढ़ सको तो पढ़ना


बिन कहे मेरी आँखों के भाव
तुम्हारे दिल में उतर जाते थे.
कभी एक शरमाई सी गले मिली शाम
सब बातें कर जाती थी
एक आलिंगन आँगन में झिझका सा
ज़िन्दगी सुकून से भर जाता था
जाते जाते मुड़कर देखने के बहाने
हम कुछ पल साथ फिर जी लेते थे
जाने से ज्यादा उस हिलते हाथ में
फिर आने के वायदे होते थे


एक बार फिर आओ जाना
कौन जाने इस बार हम फिर कोई नयी भाषा तलाशें !!!

रविवार, अक्टूबर 23, 2011

:)


प्यार के दौर में
छूट जायेगा साथ मेरा
अपनी ही आत्मा से
ऐसा पता ना था
जब सोचा फुरसत में बैठकर
ये ब्रह्म ज्ञान पाया
मेरी आत्मा मेरे ही पास रहती
तो वो तुममे एकाकार कैसे होती?

गुरुवार, सितंबर 29, 2011

तुम


खोजता था मैं गुम हुए अहसासों को
तुम आयी मुझसे सेंकडो नए जज़्बात भर गयी
किया था जब अलग मेरे वृक्ष ने मुझको
तुम मुझे रोंप, नयी कोपलें खिलने वादा दे गयी
अँधेरे को मान बैठा था मैं नियति अपनी
तुम अपने जीवन का उजियारा मुझे दे गयी
रंग सारे छोड़ मुझे आसमान में जा बसे तब
तुम मुझे इन्दधनुष के सारे रंगों से परिचित करा गयी
नेराश्य ने जब मुझमे घर किया
तुम उम्मीदों के हज़ारों दीप प्रज्वल्लित कर गयी
डरने लगा था हवा के झोंको से भी जब मैं
तुम मुझमे तूफानों में अटल रहने का साहस भर गयी
दुनिया मुझे जब परदे के पीछे रखती थी
तुम मुझमें रंगमच का कलाकार बनने का होंसला भर गयी
मेरे जीवन की रिक्तता को
तुम पूर्णता से भरती रही
घुटती थी जब साँसे मेरी
तुम मुझमे प्राण फूंक गयी !

मंगलवार, अगस्त 23, 2011

:)



जब मुस्कुरा कर देखा तुमने
ज़िन्दगी खूबसूरत सी लगने लगी
ये मुस्कुराहटें यूँ ही आपस में बदलती रहें
तो ये जनम मुकम्मल हो जाए :)

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

गुरु शिष्य सम्बन्ध


अभी रविवार को मैं दिल्ली गयी हुई थी अचानक एक फ़ोन आया
मैडम आप कहाँ हो?
मैंने कहा दिल्ली, क्यूँ क्या हुआ....
आप कब आओगे आपसे मिलना था....

जब वापस घर आयी फिर कॉल आया...मैडम आओ कालेज आ रहे हो..मैंने कहा हाँ अभी आ रही हूँ...ऐसा क्या हुआ की इतने फ़ोन कर रहे हो तुम लोग...कालेज पहुचती हूँ तो देखती हूँ मेरे स्टुडेंट्स को कुछ आवेदन पत्र वगेरह को सत्यापित करना था और जिनकी अंतिम तिथि आज की ही थी....मैंने सत्यापित करके कहा अरे किसी और से करा लेते ना आज इतनी भीड़ होगी फार्म जमा करने का अंतिम दिन है...पहले भी कितनी बार कहा है किसी और टीचर से मेरा नाम लेके करा लिया करो.....
मैडम हमें आपसे ही करना है...क्यूँकी आपके सत्यापित करने से हमें आपका आशीर्वाद भी मिल जाता है और ये गुड लक जैसे काम करता है इसलियें हम आपके ही पास आते हैं.

ये सुनकर मैं एकदम दंग रह गयी....समझ नहीं आया क्या प्रतिक्रिया दूं... आज भी विद्यार्थियों के लिए शिक्षको की शुभकामनाएं इतना मायने रखती है....मैं नहीं जानती उनके इस विश्वास, श्रद्धा के लिए क्या कहूँ....ये अहसास एकदम निशब्द है...जिसको मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी...ये अहसास मेरा विश्वास गहरा करने में की मैंने सही राह चुनी है और मुझे मेरे विद्यार्थियों को और अच्छी शिक्षा देने के लिए हमेशा प्रेरणा देता रहेगा ! मैं ज्यादा नहीं अगर कुछ लोगों के जीवन को दिशा देने में ही सक्षम रहूँ तो ये मेरी शिक्षा, मेरी परवरिश की सबसे बड़ी सार्थकता साबित होगी!

मंगलवार, फ़रवरी 01, 2011

मन का उजाला



ज़िन्दगी में कितने ही अँधेरे आयें
पर मेरे मन का उजाला
हर अँधेरे को खिलखिलाती सुबह बनाने ,
और हर रात को जगमगाने को तैयार है :)

बुधवार, दिसंबर 29, 2010

समाज का संगीत: समाजशास्त्र



जब भी कोई मुझसे पूछता है मैं क्या पढ़ाती हूँ या मैंने किस विषय में पढाई की है और मैं कहती हूँ मैं समाजशास्त्र पढ़ाती हूँ तो अधिकांशत लोगों की यही प्रतिक्रिया होती है ये कौनसा विषय है ? क्या ये भी पढाये जा सकने लायक है, क्या ये वही समाजशास्त्र है जिसे विद्यालय में सामाजिक विज्ञानं कहते थे, और फिर अगली बात ये की कितना नीरस विषय है इसको तो छोटी कक्षा में पढने में ही इतना बोर हो जाता था अब इतने बड़े होकर मैंने इसमें ही इतनी पढाई कर ली, और अब महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में ये पढ़ाती भी हूँ. तो मैं उन्हें तरह तरह से बताती हूँ मैंने क्यूँ ये विषय लिया, इसमें क्या है. तभी से कई दिन से मेरे मन में ख्याल आ रहा था क्यूँ ना मैं अपने ब्लॉग पर भी इस विषय के बारे में अपने विचार लिखू और मुझे कैसा लगता है जब मैं इस को पढ़ती या पढ़ाती हूँ.

समाजशास्त्र समाज का संगीत है. ऐसा संगीत जिसका हर सुर, हर धुन, हर शब्द, हर गीत इंसान ने रचा है. वो संगीत जो सृष्टि की प्रथम नीव का साक्षी है, उसके हर उत्थान, हर पतन की कहानी सुनाता है, सृजन से विश्वंश, न्रशंस से देव बनने की अदभुत गाथाये कहता है. सृष्टि की शुरुआत करने वाले प्रथम जोड़े की रचना से शुरू कर हर अंत और फिर पुनर्जनम की कड़ी से कड़ी जोड़ता है, दुनिया के हर कोने में अलग अलग रंगों के लोगों, बोलियों, लिपियों, नृत्यों, संगीत, संस्कृति की ना केवल जानकारी देता है बल्कि हर एक इंसान को दूसरे से जुड़े होने का अहसास दिलाता है. भारतवर्ष में विभिन्न त्योहर्रों का जश्न हो, की पश्चिम में क्रिसमस के रंग समाजशास्त्र ही है जिसने विश्व की एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति से जोड़ दिया है. आज हर देश में एक छोटा दूसरा देश लाकर खड़ा कर दिया है. संगीत जो लोगों के दिल से ना केवल जनमता है बल्कि लोगों के दिलों को जोड़ता है. वैसे ही ये विषय दुनिया के हर कोने के इंसान को एक दूसरे से जोड़ता है. अगर आज कहीं एक समस्या है तो उसकी जड़ तक जाकर कारण का पता लगा उसका निदान करता है बिलकुल वैसे ही जैसे एक साजिंदा शब्दों को धुन प्रदान कर देता है या वाद्य यंत्रों की त्रुटियों को सुधार देता है. जैसे सात सुरों से संगीत बनता है वैसे ही समाज के या कहूँ इंसान के जीवन के हर पहलु से मिलकर समाजशास्त्र बनता है.

जब मैंने ये विषय पढना शुरू किया मुझे भी लगता था क्या होगा इसमें, कई बार अरुचिकर लगा पर जब मैंने उसको जीवन से जोड़कर देखा तो पाया यही तो जीवन का संगीत है वो संगीत जो जिंदगी में मिठास घोल देता है, जो हमें सीखता है की किसी भी मान अभिमान से ऊपर हम इंसान हैं. वो संगीत जो प्यार करना सीखता है और कहता है अपने धर्म, वर्ण, भाषा, पहनावे, खान-पान यहाँ तक की अपने अहम् को छोड़ तुम मेरे पास आओ और देखो हम मिलकर कितना सुन्दर जहान बना सकते हैं, वो जहान जहाँ तुम तुम हो मैं मैं भी फिर भी हम है. वो संगीत जो सीखाता है तुम अपने रंगों को सहेजो मैं अपने रंगों को सहेजूँ, ना तुम कुछ खो ओ ना मैं कुछ बिसारूँ पर हम दोनों मिलकर नए रंगों को जन्म दे....जहान में बिखराए :)

शनिवार, दिसंबर 18, 2010

:)

वो खुदा जिसका नाम था हर अजान में
वो हमें पहले कभी नज़र ना आया
पर जबसे तुझसे इश्क हुआ
उसके होने का अहसास हर पल पाया !

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

निफ्ट उर्फ दर्ज़िगिरी का स्कूल





उफ्फ 8 बज गये 10 बजे निफ्ट पहुचना है और ये जे. एन. यू. में ऑटो नही दिख रहा और ये बस को भी आज ही नखरे करने हैं. यहाँ तो सर्दी की सुबह 8 बजे भी ऐसे लगता है जैसे आधी रात हो. और आज प्रियंका की एंट्रेन्स परीक्षा है क्या करूँ मैं...किसी तरह हम गोदावरी हॉस्टिल से झुंझलाते बाहर मेन गेट पर आते हैं. 2-4 ऑटो खड़े हैं.
भैया जी निफ्ट चलोगे, गुलमोहर पार्क.

मेडम जी ये नीफेट क्या है? और गुलमोहर पार्क?

अरे भैया वही खेल गाँव के पास, हौज़ खास में.

मेडम वो तो समझ आया चलो आप दूसरा ऑटो कर लो मुझे नही पता.

दूसरा ऑटो भैया ने भी ये कहा........... इनको नही पता भगवान क्या करूँ?

अचानक मेरे मुँह से निकला अरे भैया वही जहाँ दर्ज़िगिरी सीखते है, उसका बड़ा सा संस्थान, वही स्कूल जैसा....वही जहाँ सिलाई-कटाई-डिज़ाइन बनाना सीखते हैं...जहाँ बाहर चाय कि थडियों पर लड़के लड़कियों रात दिन बैठे रहते हैं

ओह तो वहाँ जाना है आपको, पर आप तो जी जे.एन.यु की लगती हो वहाँ कहाँ?

अरे भैया मीटर डाउन करो और चलो.

मेडम 150 लगेंगे .......भैया 9 कि. मि के इतने रुपये मेरे पास नही है 75 मे ले चलो ना वैसे तो 60 बनते हैं.

अरेssssssss मेडम आप दर्ज़िगिरी सीखने के साल के 30000-40000 रुपाए लगाओ और हम बेचारो को ऑटो के इतने पैसे भी नही दे सकते...आप तो जी शाही लोग हो.

हम ऑटो में बैठे 125 रूपीए तय करके.

बैठते ही ऑटो वाले ने कहा मेडम कितने साल का कोर्स है?

मैने कहा भैया जी 3 और 2 साल के.

ऑटोवाला बोला मेडम मैं एक अच्छे दर्जी को जानता हूँ, जमना पार 3 महीने मे टकाटक दर्ज़िगिरी आ जाएगी बस 1500 दे देना. आपको पता नही है म ब्लॉक, ग्रेटर कैलाश में माल भेजता है वो.

मैं प्रियंका को देख मुस्कुराती हूँ और कहती हूँ चलो किसी ने तो हम बेवकूफो को बुद्धि दी :)

रविवार, जुलाई 25, 2010



आजकल पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते मेरे,
शायद मेरे पैरों में इश्क के पंख लग गए हैं ♥
 

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