रविवार, जुलाई 25, 2010



आजकल पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते मेरे,
शायद मेरे पैरों में इश्क के पंख लग गए हैं ♥

रविवार, जुलाई 18, 2010

तुम एक नदी खूबसूरत सी ,
जिसके मीठे जल से
मेरी आत्मा तृप्त हो गयी है!

रविवार, जून 13, 2010

गुदगुदी


कुछ दिनों पहले मुझे किसी ने एक चुटकुला भेजा जिसे पढ़कर मैं अपनी हंसी रोक ही नहीं पा रही थी

भिखारी : बेटी दो दिन से कुछ नहीं खाया, कुछ खाने को दे दे.
लड़की: बाबा अभी खाना नहीं बना है.
भिखारी:कोई बात नहीं मेरा मोबाइल नंबर ले लो जब बन जाए मिस्ड कॉल दे देना :)

सोमवार, जून 07, 2010

तो?



अगर चांदनी की तरह तुम मेरे जीवन में उजियारा न करती....तो
तो?
मैं तुम्हे प्यार न करता!

अगर बारिश में तुम मोर जैसे न नाचती........ तो
तो ?
तो मैं तुम्हे प्यार न करता.

अगर तुम्हारी हंसी में घुंघरुओं जैसा संगीत न होता......तो
तो?
मैं तुम्हे प्यार न करता!


अगर तुम लड़की न होती...तो
तो? तो? तो? क्या
तो मैं तुम्हे प्यार न करता!

शनिवार, जून 05, 2010

:)


एक दिन चाँद मेरी खिड़की पर आया
और बोला क्यूँ बैठी हो
आकाश में निगाहें लगाये
अब तो मैं आ गया.
मैंने भी हंसकर कहा
तुम तो आ गए पर क्या करूँ
दिल को अभी इशारा नहीं मिला की
वो भी तुझे देखने छत पर आ गया.
अगर मुझे, तुझे देखने पर
उसकी आँखों में झांकने का
अहसास न होता तो
अ चाँद मुझे भी तेरा इंतज़ार न होता!

मंगलवार, अप्रैल 06, 2010


मुझे पानी अपनी ओर खींचता है और तुम्हारी आँखों में ....मुझे पूरा समंदर नज़र आता है.

रविवार, मार्च 21, 2010


प्रकृति की तरह बसंत, शीत, वर्षा और गर्मी के अनुरूप अपने आप को बदल लो ....न दर्द उठेगा, न कसक. हमारा मन एक जीवित नदी है...ऊपर से सूखी रेत और भीतर से कभी न सूखने वाला निर्झर. शायद यहीं से इंसान को जीने का रस मिलता है.

बुधवार, मार्च 10, 2010



ज़िन्दगी में अगर कोई रिश्ता छूटे तो ऐसे मोड़ पर छूटे की अगर फिर कभी मिलें तो मिलने की ख़ुशी चाहे न हो पर मिलने का दुःख भी न हो...

शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2010

रात आधी खींचकर मेरी हथेली एक उँगली से लिखा था 'प्यार’ तुमने


आज बहुत कुछ लिखने का मन है..पर मेरे विचारों मेरी भावनाओ को शब्दों में पिरो पाना बहुत मुश्किल हो रहा है......बार बार कुछ लिखती हूँ कुछ मिटाती हूँ...अचानक से याद आती है मुझे हरिवंशराय बच्चनजी की वो कविता जो मैंने न जाने कितने बरसों पहले पढ़ी थी पर आज पहली बार मैंने खुद को इस कविता को जीते हुए पाया.

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग इस संसार में
है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर।
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अंधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने
पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ।
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने।

सोमवार, फ़रवरी 15, 2010




हैं अरमान बहुत से इस दिल के
और हैं होंसले भी बुलंद बहुत इस दिल के
देखे कब ये दिल जिद्द पर आता है
और तुझको तुझ से चुरा ले जाता है !


चित्र साभार गूगल

रविवार, जनवरी 17, 2010

अजनबी सा अहसास

आज एकाएक फिर सीखा कि प्यार की प्रक्रिया कभी स्थिर नहीं होती या तो वह विकसित होती चलती है या निगति की और बढती है. हम सोचते हैं 'अलग हो गए', 'भूल गए', प्यार 'मर' गया, 'अब कुछ नहीं 'बचा', या की 'भूला दिया', इसलिए 'क्षमा' हो गयी. पर वास्तव में यह होता नहीं. 'भूलना' है ही नहीं. याद दब जाती है तो भी क्रियाशील रहती है.

अभी इधर कुछ नया कुछ भी घटा नहीं है, पर आज मन एकाएक इतना अजीब हो आया की मैं अचकचा गयी ; पहचाना कि एक अमर्ष भरा विरोध भाव मन में है ( द्वेष, नफरत, गुस्सा शायद इस अहसास के लिए सही शब्द नहीं है ) 'हुआ' केवल ; इतना की दूर राह चलते की पीठ देखी और क्षण भर को लगा की वह है, और एकाएक विरोध का भाव उमड़ आया.

रविवार, जनवरी 10, 2010

ज़िन्दगी की भाग दौड़ में कुछ छूटते रिश्ते, कुछ टूटते सपने यही है नियम प्रकृति का ?
नहीं मैं नहीं मानती इन छोटी छोटी बातों को जो कर दे खाली मेरे अंतर्मन को,
हारना इस दिल का काम नहीं, और छोड़ना मेरी फितरत नहीं ...

शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

तुम्हारे पसंदीदा डायलोग


तुम जब भी मिलती हो नयी सी लगती हो
ये मेरा भ्रम है की तुम्हारा जादू ?

तुम्हारी आँखे हैं की आइना,
जैसे ही देखो दिल का हाल पता चल जाता है.

अरे कहना था न मुझे तुमने क्यूँ तकलीफ की,
हुज़ूर की खिदमत में नाचीज़ हमेशा हाज़िर है.

तुम हंसती हो तो लगता है
जैसे मंदिर में घंटिया बज रही है.

तुम ऐसे चुप मत बैठा करो
मुझे लगता है सारा जहान नाराज़ है.

तुम भी न इतनी झल्ली क्यूँ हो, देना था न जवाब
अच्छे से एकदम करारा तुम्हारे गुस्से जैसा .

मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

शिक्षा के बदलते प्रतिमान

कॉलेज शिक्षा विभाग में आये मुझे अभी महिना भर ही हुआ है और मैं अपने आपको इस माहौल के अनुकूल नहीं बना पा रही हूँ. महाविद्यालयों में विद्यार्थी पंजीकरण काफी ऊँचा है पर कहीं कक्षा नहीं लगती और कहीं विद्यार्थी नहीं आते. अध्यापक गण भी विद्यार्थियों को पढ़ने की बजे अपने व्यक्तिगत कार्यों में व्यस्त हैं. इन दिनों महाविद्यालयों में रुकने की अवधि पहले की बनिस्पत २ घन्टे घटा कर ५ घंटे कर दी गयी है और साथ ही छठा वेतनमान भी लागू कर दिया गया है. इसके बावजूद शिक्षक महाविद्यालय में रहने से कतराते हैं और जो एक दो घंटा वहां रहते हैं उनमे भी कक्षाएं न के बराबर ले रहे हैं. मैं समझ नहीं पाती शिक्षक जो समाज का भविष्य निर्माता है वही अगर इस प्रकार की प्रक्रियाओं में लिप्त होंगे तो आने वाले समय में क्या होगा. दूसरी और विद्यार्थी है जिन्होंने छात्रवृति पाने के लिए महाविद्यालय में दाखिला तो करवा लिया है, पर कक्षों में आने की फुर्सत नहीं है. महाविद्यालय के विकास को दर्शाने के लिए कंप्यूटर सेंटर, नए नए कोर्से खोल लिए गए हैं, विद्यार्थियों के सर्वांगीन विकास हेतु विभिन्न कार्यकर्म चलाये जा रहे हैं . पर ये सब भी विद्यार्थियों को महाविद्यालय में लाने में सहायक सिद्ध नहीं हो रहे है.

अभी बहुत कुछ है लिखने के लिए पर सुबह उठ कर मुझे महाविद्यालय जाना है और कक्षा भी लेनी है. मैं उम्मीद करती हूँ की मेरे ब्लॉग को पढने वाले पाठक मुझे कुछ प्रोत्साहित करंगे अपने विचारों के साथ ताकि मैं इस विषय में लिखने की कोशिश को बरक़रार रखु.

नोट
मेरी कक्षा के कुछ विद्यार्थी नियमित रूप से आकर मुझे कृतार्थ कर रहे हैं, मैं उनकी आभारी हूँ की मुझे महाविद्यालय में खाली या इधर उधर चाय पीते हुए अपना समय व्यतीत नहीं करना पड़ता :)

रविवार, नवंबर 08, 2009

तुम एक आम का पेड़ जिसकी शीतलता ने हर पल मुझे सहलाया है,
जिसके फलों की मिठास से मेरा सारा जीवन मिठास से भर गया !

मंगलवार, सितंबर 22, 2009

जो नहीं है उसका अफ़सोस करने और दुःख मनाने से अच्छा है की जो है और जो मिल रहा है उसकी ख़ुशी मनाई जाए :)

सोमवार, सितंबर 21, 2009

तेरी नींद के लिए लुटाने पड़े
सपने मेरे ख़ज़ाने से तो सौदा बुरा नहीँ
तेरी आँखों की चमक के लिए लेनी पड़े
रोशनी उधार सूरज से तो भी सौदा बुरा नही
तेरी एक हँसी के लिए थामे रखने पड़े
आँसू अपनी आँखों मे तो भी सौदा बुरा नहीं!

शनिवार, अगस्त 22, 2009

उलझे से रिश्ते

क्यूं सब कुछ सही चलते चलते अचानक से रुक जाता है क्यूं मन की उलझने कभी ख़त्म नही होती. अपने ही नही बल्कि अपने आस पास के लोगों को देखूं तो भी लगता है क्यूं कुछ रिश्ते हम सारी उमर निभाने के लिए अभि-शिप्त होते हैं क्यूं हम चाहकर भी उस बंधनो को तोड़ नही पाते जो हमें क़ैद का अहसास दिलाते हैं हम सारी उमर अपने ख़ून से इन रिश्तों को सीचतें हैं पर कभी ये रिश्ते बढ़कर हमारे माथे की छाँव नही बन पाते, ऐसा क्यूं हैं क्यूं हर क़दम पर परीक्षा देनी पड़ती है एक बार नही बार-बार. अपने विश्वास की, अपने प्यार का सबूत देना पड़ता है दिन का कोई पल तो ऐसा आए जब हम अपने मन की बात बिना किसी डर के सामने रख पाए. क्या कभी कोई उस सच तक उस जगह तक पहुँच पाएगा जहाँ क़दम क़दम पर परीक्षा नही देनी पड़ेगी, प्रतीक्षा नही करनी होगी?

मंगलवार, अगस्त 04, 2009

राखी का स्वयंवर


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


प्रतिद्वन्दिता के चलते हुए आजकल टी वी चेनल्स मे होड़ लगी हुई है की कौन कितने ज़्यादा दर्शकों को अपनी और खीच पाए और टी. आर. पी. चार्ट में उच्च स्थान पाए. ऐसे ही एक ख्याल को ध्यान में रखते हुए राखी का स्वयंवर नाम का धारावाहिक दर्शको के सामने प्रस्तुत किया गया. सीरियल के कुछ एपिसोड मैने भी देखे और देख कर लगा की हमारे आदर्श कितने नीचे गिर चुके हैं की हम इस तरह के धारावाहिक दर्शको के सामने पेश कर रहे हैं मात्र पैसा पाने के उद्देशय से. पूरे धारावाहिक की प्रस्तुति किसी परी कथा के जैसे की गयी और बार बार ये वाक्य भी दोहराया गया की जैसे सीता मैया का स्वयंवर हुआ वैसे ही अब वैसे ही इस युग में राखी का स्वयंवर है. कितनी अजीब बात है हम राखी जैसी लड़की का सीता के साथ तुलना कर रहे हैं. सीता वही स्त्री जिस पर हर स्त्री अभिमान कर सकती है, चाहे कोई युग रहा हो कोई काल. सीता सच्चाई का प्रतीक जिसने किसी संकट , दुख की परिस्थति मे हार नही मानी धेर्य से काम लिया. जिसने अपने आत्म सम्मान के लिए मर्यादा पुरोशोत्तम, सभी के लिए आदरणीय राम के साथ वापस जाने से इनकार कर धरती की गोद मे समाना बेहतर समझा.

एक एक स्वयंवर का उम्मेदवार प्रतियोगिता से बाहर होता गया और राखी को कहते सुना गया की उसको बहुत दुख हो रहा है, दिल टूट रहा है. जब भी ये सब नोटॅंकी मैं देखती मन में सवाल आता राखी मेडम अगर आपका दिल हर प्रत्याशी के जाने से टूट रहा है तो क्या आपका दिल इन सभी दुल्हो पर आ गया है और आप इन सबसे शादी करना चाहती हैं? इतना नाटक, फालतू का भावनात्मक नाटक किस लिए और पीछे से राम का कहना की आप सबका दिल भी राखी के साथ रो रहा है और ऐसा ही कुछ. अरे भाई अगर सब पसंद थे तो कर लेना था ना बहुपति विवाह किसने रोका है, वैसे भी जब आपको किस-किस देवी देवता, नारी की प्रतिनिधि, और भी जाने कैसे कैसे खिताबों से नवाज दिया गया है, सारे देश की, मीडीया की सहानभूति आपके साथ है तो कौन रोकता आपको बहुपति विवाह करने से ? राखी के विवाह के लिए जो सारा टेलीविज़न जगत उठ कर बधाई देने आ पहुचा, कोई रिश्तेदार कोई दोस्त बनकर असल ज़िंदगी में क्या वाकई वो दिल के किसी कोने में इज़्ज़त देते हैं जो ये सब नाटक कर रहे हैं? हल्ला मचता रहा स्वयंवर का और धारावाहिक का अंत कर दिया गया राखी की सगाई पर. क्या राखी और, स्क्रिप्ट लिखने वाले को नही पता था राखी को दूल्हे को समझने का समय चाहिए? दर्शकों को बुद्धू बनाने के लिए हल्दी, मेहंदी जैसी सब रस्मे दिखाई गयी और अंत विवाह की जगह सगाई दिखा दी.

कितनी अजीब विडंबना है हमारे समाज की हम एक और अपने घर की लड़कियों को राखी सावंत जैसी बनने से बचाना चाहते हैं और दूसरी और खुद ही ऐसे धारावाहिक देखते हैं और उसके झूठे आँसू देख रोते हैं. टी. वी. जैसा माध्यम जिसे समाज के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए आज पैसे कमाने के लिए दर्शको को ऐसे धारावाहिक परोस रहा है. मीडीया वाले जो समाज में जागरूकता लाने की भूमिका निभाते है आज अपनी उँची कमाई के लिए जनता के सामने ऐसे धारावाहिकों की अप टू डेट, कवर स्टोरी लेकर हाज़िर रहते हैं. ऐसे में ज़िम्मेदारी किसकी बनती है, अब हम सबको ही तय करना .

एक बार तो मेरा भी दिल किया की क्यूँ मैं राखी जैसी लड़की के बारे में लिख अपना समय बर्बाद कर रही हूँ पर फिर मुझे लगा यदि सब कुछ देखने समझने के बाद भी शुरुआत हम नही करेंगे तो कौन करेगा. सिर्फ़ किसी की आलोचना करने से, कुढने से कुछ नही होगा बल्कि ज़रूरी है की ये बात और लोगो तक पहुचे ताकि अपने अच्छे और भले दोनो का चुनाव हम स्वयं कर पाए ना की कोई और.

बुधवार, जुलाई 29, 2009

फ़ुर्सत के पल, भूली बातों के नाम

कभी तो हम फिर से बैठकर फ़ुर्सत मे बातें करे. जब तुम ये ना कहो फटाफट बोलो क्या बात है, ना मैं कहूँ जल्दी बोलो कॉलेज जाना है. बस बातें शुरू हो और बिना किसी अवरोध के एक बात दूसरी का सिरा पकड़े और ये सिलसिला चलता चले. कभी चाय की चुस्कियों के साथ तो कभी पेप्सी के केन के साथ. तुम शुरू तो करो अपने ऑफीस से पर खोते जाओ अपने कॉलेज, स्कूल की बातों मे. तुम बयान करो अपने मॅनेजर के खड़ूसपने को और मैं भी देखने लगूँ उसमे अपने पीएचडी के सूपरवाइज़र को. जब करेंगे बातें हम अपने सहकर्मियों की तो कहीं से निकल ही आएँगे कुछ भूले बिसरे यार दोस्त पुरानी तस्वीरों. कभी हम करने लगे बातें अपने स्कूल के मनपसंद टीचर की तो कभी पी टी और फिज़िक्स के उस डरावने टीचर की. कभी याद करे केमिस्ट्री की नाज़ुक सी मेडम की तो कभी गणित के टीचर के डंडे को. कभी याद करे दीदी की गुल्लक से चुराए 1रूपीए को तो कभी स्कूल के लंच पीरियड मे बचाए पैसो से खरीदे जन्मदिन के तोह्फो की. गुब्बारेवाले की आवाज़ नही सुनती अब यहाँ कभी शोक मनाए इस बात का तो कभी मुस्कुराए भरी दुपहरी में आइस्क्रीम वाले की घंटी सुन नंगे पैर दौड़ कर आइस्क्रीम लाने को याद कर. मिलकर तय करें मंदिर में दोनो वक़्त की आरती मे जाके प्रसाद पाने की खुशी ज़्यादा थी या उसके आँगन मे खेलने की. बस कहें हम अपने अपने दिल की, ना ज़्यादा दिमाग़ लगाए ना परखने बैठे कुछ भी.
 

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